गुप्त साम्राज्य के पतन के कारण | Gupt samrajya ke patan ke karan

गुप्त साम्राज्य के पतन के कारण | Gupt samrajya ke patan ke karan 

हैलो नमस्कार दोस्तों आपका बहुत - बहुत स्वागत है, इस लेख गुप्त साम्राज्य के पतन के कारण (Gupt samrajya ke patan ke karan) में।


दोस्तों इस लेख के माध्यम से आप गुप्त साम्राज्य के पतन के कौन - कौन से कारण है जान पायेंगे। तो आइये शुरू करते है, यह लेख गुप्त साम्राज्य के पतन के कारण:-


गुप्त साम्राज्य के पतन के कारण


गुप्त साम्राज्य के पतन के कारण Gupt samrajya ke patan ke karan 

गुप्त साम्राज्य जिसकी स्थापना श्रीगुप्त नामक शासक ने की तथा वास्तविक संस्थापक चन्द्रगुप्त प्रथम था, जिस वंश में चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य, समुद्रगुप्त जैसे महाप्रतापी शासकों ने जन्म लिया उसकी स्थापना चौथी शताब्दी (4th century) में हुई थी।


इस वंश के शासकों ने लगभग छठवीं शताब्दी (6th century) तक शासन किया किंतु विभिन्न प्रकार के कारणों के फलस्वरुप गुप्त साम्राज्य का पतन छठवीं शताब्दी के लगभग मध्य में हो गया।


गुप्त साम्राज्य को विस्तृत और सशक्त बनाने में सबसे प्रमुख भूमिका सबसे प्रसिद्ध गुप्त शासक समुद्रगुप्त जिसे भारत का नेपोलियन (Napoleon of India) और चंद्रगुप्त द्वितीय ने निभाई थी।


इनकी लगातार विजयों और तथा शासन संचालन के कौशल के परिणामस्वरूप भारत में मौर्य साम्राज्य के पश्चात विलुप्त हुई राजनीतिक एकता फिर से स्थापित हुई। गुप्त साम्राज्य में जन्म लेने वाले पराक्रमी शासकों ने गुप्त साम्राज्य को अक्षुण्ण


बनाए रखने का लगातार प्रयास किया। गुप्त साम्राज्य का अंतिम सबसे प्रतापी शासक स्कंदगुप्त था। उसके शासनकाल के बाद उसके उत्तराधिकारी अयोग्य और निर्बल निकले। जब स्कंदगुप्त की मृत्यु 487 ईसवी में हो गई तब उसके पश्चात गुप्त साम्राज्य धीरे-धीरे


से ह्रास की ओर बढ़ता गया और 550 ईसवी तक पूरी तरह से विलुप्त हो गया। गुप्त साम्राज्य का पतन कोई आकस्मिक घटना नहीं मानी जाती है और ना ही किसी एक कारण के फलस्वरूप इस बड़े साम्राज्य का पतन हुआ, क्योंकि गुप्त साम्राज्य के पतन


के लिए कई कारण जिम्मेदार हैं, विभिन्न इतिहासकारों ने भिन्न-भिन्न मत दिए हैं, जिसमें प्रो राय चौधरी ने कहा कि, गुप्त वंश के पतन के कारणों की खोज में हमें कहीं दूर नहीं जाना है, गुप्त वंश के विनाश के अधिकांश कारण लगभग वही हैं,


जिनसे 14 वीं शताब्दी में तुर्की साम्राज्य अथवा 18वीं शताब्दी में मुगल साम्राज्य का पतन हुआ था, जबकि डॉ मजूमदार कहते हैं, कि गुप्त साम्राज्य का पतन उन कारणों के फलस्वरुप हुआ है, जिनके अधीन पुराने दिनों में मोर्य वंश का तथा कालांतर में मुगलों का हुआ था।


गुप्त साम्राज्य के पतन के कारण Gupt samrajya ke patan ke karan 

गुप्त साम्राज्य के पतन के प्रमुख कारण निम्न प्रकार से हैं:-


गुप्त साम्राज्य के अयोग्य उत्तराधिकारी Inept heirs of the Gupta Empire

गुप्त साम्राज्य के पतन और विनाश का सबसे प्रमुख कारण गुप्त साम्राज्य में उत्पन्न होने वाले अयोग्य और निर्बल उत्तराधिकारी थे। अंतिम शूरवीर गुप्त शासक स्कंदगुप्त के पश्चात गुप्त सिंहासन पर बैठने के लिए कोई भी शक्तिशाली और वीर शासक नहीं था


और गुप्त साम्राज्य में राजतंत्रात्मक स्वरूप हुआ करता था और ऐसे शासन में राज्य की उन्नति और पतन राजा की योग्यता पर निर्भर करता है। इसीकारण समुद्रगुप्त और चंद्रगुप्त जैसे योग्य और महावीर शासकों ने गुप्त साम्राज्य को इतिहास में सबसे गौरव स्थान दिलाने में सफलता प्राप्त की,


किंतु स्कंदगुप्त के बाद जो उत्तराधिकारी हुए वह निर्बल और अयोग्य थे, इसीलिए गुप्त साम्राज्य को वह अक्षुन्नय बनाएँ ना रख सके तथा धीरे-धीरे गुप्त साम्राज्य पतन की ओर बढ़ता गया। स्कंदगुप्त के बाद गुप्त साम्राज्य में कोई भी इतना प्रतापी राजा नहीं हुआ, जिसने अपने साम्राज्य को बचाने की शूरवीरता हो, किंतु बुद्धगुप्त और भानुगुप्त ने गुप्त साम्राज्य के विनाश को रोकने के लिए अनेक प्रयास किए पर वे असफल रहे।


बाहरी आक्रमण External attack

गुप्त साम्राज्य के पतन का एक अन्य मुख्य कारण गुप्त साम्राज्य पर निरंतर होने वाले विदेशी आक्रमण थे।कुमारगुप्त के शासनकाल में शुंग के शासको ने और स्कंदगुप्त के समय हुणो के आक्रमण उस समय के योग्य गुप्त शासकों ने विफल कर दिया थे,


किंतु यह दोनों वंश लगातार ही गुप्त सम्राट पर आक्रमण करते रहते थे और स्कंदगुप्त की जब मृत्यु हुई तो इन दोनों वंशों ने फिर से गुप्त साम्राज्य को आघात पहुंचाना शुरू कर दिया और आक्रमण करते हुए चित्रकूट तक भी पहुँच गए, इसीलिए इतिहासकारों का मानना है,


कि गुप्त शासकों को निर्बल बनाने में सबसे प्रमुख हाथ हूण वंश के शासकों का है। प्रमुख इतिहासकार डॉ आर एस त्रिपाठी भी हूण वंश के शासकों को गुप्त वंश के पतन का कारण मानते हैं,


किंतु इतिहासकार डॉ मजूमदार मानते हैं, कि गुप्त वंश को अधिक नष्ट करने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका हूण वंश के शासकों की नहीं थी। गुप्त वंश की सत्ता को नष्ट करने में सबसे प्रमुख हाथ तो मालवा के यशोवर्मा जैसे शासकों का था।


सामंतो और प्रांतपतियों का स्वतंत्र होना independence of feudal lords and governors

गुप्तकाल का साम्राज्य प्रांतों में विभाजित था, जहाँ पर गुप्त वंश के शासक ही अपने योग्य कर्मचारी को या फिर किसी राजा या महाराजा को वहाँ का शासक नियुक्त किया करते थे, किंतु वह राज्य या प्रान्त गुप्त साम्राज्य के अधीन रहता था।


गुप्त साम्राज्य के विभिन्न अभिलेखों से यह पता चलता है, कि गुप्त काल में जो प्रांतीय शासक हुआ करते थे उन्हें विशेषअधिकार, विशेष राजनीतिक अधिकार प्राप्त होते थे। स्कंदगुप्त के समय तक तो केंद्रीय सत्ता शक्तिशाली होने के कारण वह प्रांतीय शासक सुचारू रूप से शासन करते रहे,


किंतु जैसे ही स्कंदगुप्त की मृत्यु और अयोग्य तथा निर्बल गुप्त साम्राज्य के शासक पाकर वह सभी प्रांतीय शासकों ने अपनी-अपनी स्वतंत्रता की घोषणा करना शुरू कर दिया। सबसे पहले अपनी स्वतंत्रता की घोषणा सौराष्ट्र के प्रांतीय शासक ने की


इसके बाद वल्लवी के मैत्रक वंश ने फिर यशोवर्मा ने मालवा में कान्यकुब्ज में मौखरियों ने बंगाल के गोंडो ने भी अपनी स्वतंत्रता की घोषणा करदी, किंतु गुप्त वंश को सबसे अधिक क्षति मालवा के शासक यशोवर्मा ने पहुंचाई थी।


दोस्तों आपने यहाँ गुप्त साम्राज्य के पतन के कारण (Gupt samrajya ke patan ke karan) पढ़े। आशा करता हूँ, आपको यह लेख अच्छा लगा होगा।

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