सुमित्रानंदन पंत का साहित्यिक परिचय Sumitranandan pant ka sahityik parichay

सुमित्रानंदन पंत का साहित्यिक परिचय Sumitranandan pant ka sahityik parichay 

हैलो नमस्कार दोस्तों आपका बहुत - बहुत स्वागत है, इस लेख सुमित्रानंदन पंत का साहित्यिक परिचय (Sumitranandan pant ka sahityik parichay) में। दोस्तों यहाँ पर आप सुमित्रानंदन पंत का जीवन परिचय के साथ

सुमित्रानंदन पंत की रचनाएँ, सुमित्रानंदन पंत का भावपक्ष, कलापक्ष के साथ साहित्य में स्थान पड़ेंगे। तो आइये शुरू करते है, यह लेख सुमित्रानंदन पंत का साहित्यिक परिचय:-


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सुमित्रानंदन पंत का साहित्यिक परिचय


सुमित्रानंदन पंत का जीवन परिचय Biography of Sumitranandan Pant

प्रकृति के सुकुमार कवि और छायावाद के एक मुख्य स्तंभ के रूप में जाने जाने वाले महान व्यक्तित्व सुमित्रानंदन पंत का जन्म बागेश्वर जिले के एक कौसानी नामक गांव में 20 मई 1900 ईसवी में हुआ था।

सुमित्रानंदन पंत के पिता जी का नाम गंगा दत्त था और उनकी माता जी का नाम सरस्वती देवी था। सुमित्रानंदन पंत अपने माता पिता की आठवीं संतान थे, किंतु जैसे ही सुमित्रानंदन पंत का जन्म हुआ उसके 6 घंटे के बाद उनकी माँ स्वर्गवास को सिधार गयी।

इस प्रकार सुमित्रानंदन पंत को अपनी मां का प्रेम नहीं मिल सका उनका लालन-पालन उनकी दादी मां ने किया और उन्होंने ही सुमित्रानंदन पंत का नाम गोसाईं दत्त रख दिया। सुमित्रानंदन पंत ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा दीक्षा अपने जन्म स्थान से ही प्राप्त की

इसके बाद वह हाई स्कूल की पढ़ाई के लिए अल्मोड़ा चले गए जहाँ पर उन्होंने अपना नाम बदलकर सुमित्रानंदन पंत रख लिया।

इसके बाद उन्होंने अपने भाई के साथ क्वींस कॉलेज में भी अध्ययन किया और इलाहाबाद के म्योर कॉलेज में भी उन्हें अध्ययन करने का गौरव प्राप्त हुआ। जब वे इलाहाबाद में कॉलेज में पढ़ रहे थे

उस समय 1921 में असहयोग आंदोलन चल रहा था उस समय महात्मा गांधी के आव्हान पर छात्रों ने कॉलेज का भी बहिष्कार किया और सुमित्रानंदन पंत घर पर आकर संस्कृत बांग्ला और अंग्रेजी भाषा का अध्ययन करने लगे। सुमित्रानंदन पंत के पिताजी का निधन

होने के पश्चात सुमित्रानंदन पंत को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा और अपने पिता के ऊपर चढ़े हुए कर्ज को चुकाने के लिए उन्हें अपना खेत जमीन और घर को भी बेचना पड़ा।

सुमित्रानंदन पंत कुछ समय के लिए मार्क्सवाद के साथ भी जुड़े किन्तु आत्मा के प्रकाश का अनुभव होने पर उन्होंने एक मासिक पत्रिका रूपाभ का संपादन शुरू कर दिया कुछ समय बाद वे अरविंद आश्रम के संपर्क में

आए और उनके मन में आध्यात्मिकता की ओर जाने का विचार जागृत हुआ। इस दौरान वे कुछ समय के लिए आकाशवाणी में परामर्शदाता के रूप में भी कार्य करतें रहें और 1958 में उनकी युगवाणी से वाणी

काव्य संग्रहों की प्रतिनिधि कविताओं का संकलन चिदंबरा प्रकाशित हुई। इसके बाद एक से बढ़कर एक काव्य संग्रह उन्होंने हिंदी साहित्य को प्रदान किए और परमात्मा की अमर ज्योति में वह 28 दिसंबर 1977 को विलीन हो गए।


सुमित्रानंदन पंत की रचनाएँ Composition of Sumitranandan Pant 

सुमित्रानंदन पंत कुशाग्र बुद्धि के व्यक्ति थे, उन्होंने सात वर्ष की अवस्था में ही कविताएँ लिखना शुरू कर दी थी, और कई रचनाएँ हिंदी साहित्य को प्रदान की।सुमित्रानंदन पंत की प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित है:-

  • कविता संग्रह Kavita Sangrah 

वीणा, ग्रंथि, पल्लव, गुंजन, स्वर्ण किरण, युगांत, युगवाणी, लोकायतन, चिदंबरा। पल्लविनी, अतिमा, युगपथ, ऋता, स्वर्ण किरण, उत्तरा, कला और बूढ़ा चांद, शिल्पी, स्वर्णधूलि आदि पंत के प्रमुख कविता संग्रह है।

  • नाटक Natak 

सुमित्रानंदन पंत के प्रमुख नाटकों में रजतरश्मि, शिल्पी, ज्योत्सना आदि का स्थान आता है।

उपन्यास- हार

इसके अलावा सुमित्रानंदन पंत ने अन्य कवियों के साथ मिलकर विभिन्न संयुक्त कविता संग्रह कई संयुक्त रचनाएँ भी दी है।


सुमित्रानंदन पंत का भाव पक्ष Sumitranandan Pant ka Bhav paksh 

पंत जी स्वभाव से बड़े ही सुकोमल और शांत स्वभाव के व्यक्ति थे, इसलिए उनके काव्य में हमेशा ही कोमल भावों का ही चित्रण और उनका वर्णन दिखाई देता है।

सुमित्रानंदन पंत का संपूर्ण जीवन प्रगति की गोद में ही व्यतीत हुआ है, इसलिए उन्होंने प्रकृति चित्रण, प्रेम, सौंदर्य आदि को अपने काव्य में प्रमुख स्थान देते हुए उनका मानवीयकरण करते हुए अपनी रचनाओं में वर्णन किया है अतः प्रकृति से अधिक लगाव

होने के कारण सुमित्रानंदन पंत जी को प्रकृति का सुकुमार कवि के नाम से भी जाना जाता है। सुमित्रानंदन पंत ने भारतीय लोगों में राष्ट्रीयता की भावना उत्पन्न करने के लिए कई प्रकार की वीर रस की रचनाएँ

प्रदान की जबकि वे दार्शनिक विचारों वाले व्यक्ति थे, इसी से संबंधित विभिन्न रचनाओं में उनके ईश्वर जगत तथा दार्शनिक विचारों से संबंधित रचनाएँ देखने को मिलती हैं।


सुमित्रानंदन पंत का कला पक्ष Sumitranandan Pant ka Kala paksh 

सुमित्रानंदन पंत के काव्य की भाषा संस्कृत निष्ठ तत्सम युक्त परिमार्जित खड़ी बोली है। उन्होंने अपने काव्य में ओज और माधुर्य गुण का बड़ी ही सरलता से प्रयोग किया है। सुमित्रानंदन पंत ने अपने काव्य में प्रमुख रूप से मानवीकरण, रूपक, उत्प्रेक्षा

अलंकार के साथ ही  उपमा अलंकार का प्रयोग किया है, जिससे उनकी रचनाओं में अनुपम सौंदर्य उत्पन्न हुआ। वहीं उन्होंने वीर रस, शांत रस आदि के माध्यम से अपने काव्य को परिमार्जित करके आलोकिक बना दिया है।


सुमित्रानंदन पंत को दिए गए पुरस्कार Award for Sumitranandan Pant 

सुमित्रानंदन पंत को उनके जीवन काल में उनके अनन्य साहित्य सेवा के लिए विभिन्न पुरस्कारों से नवाजा गया है। पंत जी को उनकी कृति चिदंबरा के लिए हिंदी साहित्य का सर्वोच्च सम्मान भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार 1958 में दिया गया।

हिंदी साहित्य की सेवा के लिए पंत जी को 1961 में भारत के सर्वोच्च सम्मान पदम भूषण से सम्मानित किया गया। 1960 में उनकी कृति काला और बूढ़ा चांद के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया इसके अलावा सुमित्रानंदन पंत जी को विभिन्न उच्च श्रेणी के पुरस्कार सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार आदि से नवाजा गया।


सुमित्रानंदन पंत का साहित्य में स्थान Sumitranandan Pant ka sahitya me sthan 

प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत को छायावादी युग का एक प्रमुख स्तंभ के रूप में जाना जाता है। उन्होंने हिंदी साहित्य को माध्यम बनाकर छायावाद में विभिन्न प्रकार की रचनाएँ हिंदी साहित्य को प्रदान की। ऐसे महान कवि को छायावाद में एक प्रमुख स्थान दिया जाता है और उन्हें हिंदी साहित्य में हमेशा ही याद किया जाता रहेगा। 

दोस्तों आपने यहाँ सुमित्रानंदन पंत का साहित्यिक परिचय (Sumitranandan pant ka sahityik parichay) पढ़ा। आशा करता हुँ, आपको यह लेख अच्छा लगा होगा।

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